>भारत एक खोज

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मत कहो कि सर पे टोपी है, कहो सर पे हमारे ताज है.
आती थी एक दिवाली, बरसों में कभी खुशहाली
अब तो हर एक वार एक त्योहार है, ये उभरता-संवरता समाज है।
ये प्राण से प्यारी धरती, दुनिया की दुलारी धरती

ये अमन का दिया आंधियों में जला, सारी दुनिया को इस पे नाज़ है।
देख लो कहीं गम ना रहे, रौशनी कहीं कम ना रहे
सारे संसार की आंख हम पर लगी, अपने हाथों में अपनी लाज है।
यह पंक्तियां 1957 में बनी फिल्म अब दिल्ली दूर नहीं है के एक गीत की है। इस गीत को शोमैन राजकपूर के पसंदीदा गीतकार और समाजवादी विचारधारा से प्रभावित शैलेन्द्र ने लिखा था। यह गीत उस दौर में लिखा गया था, जब पूरी दुनिया एक नए मुल्क की ओर उमीदों भरी निगाहों से देख रही थी। यह पंक्तियां आज के दौर में भी मौजूं है। बस उसके मायने बदल गए है। दो सप्ताह पहले भी शैलेन्द्र के गीत की तरह सारे संसार की आंख हम पर लगी थी और अपने हाथों में ही अपनी लाज बचाने की जिम्मेदारी थी। बस नहीं थी तो उम्मीदें। हर ओर नाउम्मीदें थी। आर्थिक महाशक्ति की ओर बढ़ रहें मुल्क के कॅामनवेल्थ गेम्स के आयोजन में नाकाम होने की आशंका।
खेलगांव में गंदगी, डेंगू, आधे अधूरे निर्माण कार्य, सुरक्षा में चूक, भ्रष्टाचार, कई देशों की गेम्स से नाम वापस लेने की धमकी, भारत को मेजबानी सौंपने पर उठ रहे सवाल सुर्खियों में छाए हुए थे। दो सप्ताह पहले केवल दिल्ली के आसमान पर ही नहीं दिल्ली कॅामनवेल्थ खेलों पर भी संकट के बादल छाए हुए थे। दिल्ली के दामन पर लगे कलमाडी नुमा दाग इतने जिद्दी लग रहे थे कि कोई भी डिटर्जेंट इसे धोने का दावा नहीं कर सकता। तीन अक्टूबर की शाम को नयी दिल्ली में उद्घाटन समारोह की चकाचौंध ने सारे दाग धो दिए। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के नाम पर बने स्टेडियम में नये भारत की खोज हुई।

भारतीय संस्कृति में रचे बसे तीन घंटे के समारोह के जरिए दिल्ली ने अपना दम दिखा दिया। इस दबंगई के बाद दिल्ली से मुंह फेरने वाली दुनिया उसकी ओर टकटकी लगाए देख रही है। भारत ने अपनी शक्ति का अहसास करा दिया। 2006 के मेलबर्न गेम्स से जिसकी तुलना हो रही थी। 2012 के लंदन ओलंपिक से जिसे सबक सीखने की सलाह दी जा रही थी। दिलवालों की वह दिल्ली अब दुनिया के लिए पैमाना बन गई है। लंदन ओलंपिक के आयोजकों के माथे पर चिंता की लकीरें यूं ही नहीं है। जिस दिल्ली के लिए लंदन दूर की कौड़ी लग रही थी, उसी लंदन की पहुंच से दिल्ली काफी आगे निकल गई है। आधुनिक तकनीक और संस्कृति का भारतीय संगम पूरी दुनिया पर छा गया है।


भारत ने कूटनीति के मोर्चे पर भी अपनी दबंगई दिखा दी। यह पहला मौका था जब इतने बडे मंच पर भारतीयता की नुमाइंदगी मिजोरम का पहनावा कर रहा था। पड़ोसी मुल्क चीन के लिए संदेश साफ था कि पूर्वोत्तर भारत के लिए केवल जमीन का टुकड़ा भर नहीं बल्कि देश की साझा सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है। वहीं पाकिस्तान सहित उपमहाद्वीप के देशों का दिल खोलकर स्वागत कर बड़े भाई का किरदार भी बखूबी अदा किया।


उद्घाटन समारोह अद्भुत, अतुल्य, अविश्सनीय और अविस्मरणीय रहा। लंदन से प्रकाशित फायनेशियल टाइम्स में स्टेंडर्ड चार्टड बैंक के निदेशक लिखते है

भारत की ताकत का आकलन सही तरीके से नहीं किया गया। आयोजन की सफल शुरूआत कर भारत ने अपनी ताकत दिखा दी है।

 अब जवाबदारी खिलाड़ियों पर है कि वह अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर पदक तालिका में भी भारत का दबदबा दिखाए। उद्घाटन समारोह में उन्हें जो सम्मान मिला है वह देश में क्रिकेटरों को भी नसीब नहीं होता है। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री खड़े होकर उनका अभिवादन किया है। देश का सर गर्व से उंचा उठा रहे इसकी जवाबदारी अब उन पर है।

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One thought on “>भारत एक खोज

  1. >जिस भारत को हम इण्डिया बनाने पर तुले थे, उसी भारत को हमारे कलाकारों ने पुन: भारत बना दिया। दुनिया ने देखा इतना रंगीन और भव्‍य संस्‍कृतिमय भारत। आयोजकों को बधाई।

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