>सचिन तेंदुलकर, राहुल गांधी और कांग्रेस

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सचिन तेंडुलकर, कांग्रेस और राहुल गांधी। किसी भी नजरिए से देखा जाए तो तीनों में किसी तरह का कोई सामंजस्य नजर नहीं आता। सचिन क्रिकेट के मैदान पर नित नए कीर्तिमान रच रहे है। कांग्रेस अब भी देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है और राहुल गांधी इस पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव है। क्रिकेट से राहुल का रिश्ता बस इतना है कि वह कभी कभार दर्शक के रूप में क्रिकेट के मैदान पर नजर आ जाते है। इन तीनों में आपसी गठजोड़ जानने के लिए 22 साल पीछे जाने की जरूरत है।

1989 यह वही साल था जब सचिन ने इंटरनेशनल क्रिकेट में चहलकदमी थी। क्रिकेट में सचिन के हिमालयीन सफर का आगाज और कांग्रेस के शिखर से नीचे फिसलने का सफर लगभग साथ ही शुरू हुआ। सचिन महज 16 साल की उम्र में जब पाकिस्तानी गेंदबाजों का कचूमर निकाल रहे थे तो लोकसभा चुनाव में मतदाता कांग्रेस के एक के बाद एक विकेट गिरा रहे थे। आजादी के बाद यह दूसरा मौका था जब कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।

सचिन के क्रिकेट की दुनिया में एकछत्र राज की मजबूत नींव 22 साल पहले पड़ी थी। कांग्रेस के एकछत्र राज की समाप्ति का दौर भी इसी के साथ शुरू हो गया था। समय के साथ साथ सचिन अकेले ही भारतीय टीम के तारणहार बन गए तो कांग्रेस को एकला चलो की नीति को बाजू में रखकर विरोधी दलों से हाथ मिलाने पड़े।

1989 में ही तत्कालीन प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने मतदान की आयु सीमा 21 साल से घटाकर 18 साल की थी। सचिन उस वक्त पाकिस्तान की ज़मी पर मुल्क का झंडा बुलंद कर रहे थे। इसके बावजूद उन्हें अपने मुल्क में अपना नुमाइंदा चुनने का अधिकार नहीं था। सचिन की उम्र भले ही 16 साल थी लेकिन यह वही चुनाव था जिसमें राहुल गांधी ने पहली बार अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया होगा।

1989 के बाद सचिन ने पीछे मूड़कर नहीं देखा। वहीं राहुल गांधी को मतदान का अधिकार मिलने के बाद हुए हर चुनाव में कांग्रेस को सहयोगी दलों की ओर देखना पड़ा। कांग्रेस जैसे जैसे कमजोर होती गई सचिन इंटरनेशनल क्रिकेट में उतनी ही दमदारी से अपनी जगह मजबूत करते गए। देश में एकछत्र राज करने वाली पार्टी राज्यों में सिमट कर रह गई। गठबंधन के समझौते करने पड़े तो मजबूत गढ़ एक एक कर विरोधी दलों के कब्जे में जाते रहे। सचिन एक अरब से ज्यादा भारतवासियों की उम्मीदों का बोझ अपने कांधों पर लादे रहे तो कांग्रेस को देश का नेतृत्व करने के लिए गठबंधन की बैसाखियों का सहारा लेना पड़ा।

1989 से शुरू हुआ यह सिलसिला अब भी जारी है। ज्यादा समय नहीं बीता जब भुराड़ी में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था। कांग्रेस गांधी परिवार में अपना भविष्य ढूंढ रही थी। सबकी निगाहें राहुल गांधी पर टिकी हुई थी। अधिवेशन में पहले सारा मजमा सोनिया गांधी और दिग्विजय सिंह ने लूट लिया। राहुल गांधी की बारी आने के पहले ही सचिन ने दक्षिण अफ्रीका में सेंचुरियन के मैदान पर शतक जमाकर शतकों का अर्धशतक पूरा कर लिया। भुराड़ी में राहुल गांधी की बजाए सचिन की जय जयकार होने लगी। राहुल गांधी को पीछे छोड़ कांग्रेसी नेताओं में सचिन तेंडुलकर को भारत रत्न दिए जाने की पैरवी करने की होड़ मच गई।

अभी पांच राज्यों में चुनाव हो रहे है। कांग्रेस का जनाधार दरकता जा रहा है। वह अधिकांश राज्यों में गठबंधन के सहारे चुनावी समर में उतर रही है। वही सचिन की मौजूदगी में टीम इंडिया ने दुनिया जीत ली है। 28 साल बाद क्रिकेट की दुनिया में भारत का परचम लहरा रहा है। कांग्रेसी नेताओं के दामन पर भ्रष्टाचार के दाग नजर आ रहे है तो बेदाग सचिन केवल क्रिकेटरों के लिए नहीं बल्कि करोड़ों भारतवासियों के लिए रोल मॉडल बने हुए है।
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