CHAMPION: सचिन तेंडुलकर के एक फोन कॉल ने बदल दी बैडमिंटन खिलाड़ी की जिंदगी

Gold medals aren’t really made of gold. They’re made of sweat, determination, & a hard-to-find alloy called guts. -Dan Gable

यह बात अरविंद भट्ट पर सौ फीसदी सही बैठती हैं…भारत में खेलों के शौकीन यानि क्रिकेट के शौकीन कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी… खेल के ऐसे शौकीनों के लिए अरविंद भट्ट करीब एक सप्ताह पहले तक अनजाना ही नाम था… जब तक उन्होंने जर्मन ओपन का खिताब जीत नहीं लिया… वह भी 34 साल की उम्र में… वह यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले भारतीय हैं… इसके पहले कोई भी भारतीय खिलाड़ी यह खिताब जीत नहीं पाया था… उनके कोच पुलैला गोपीचंद भी नहीं… जो 1999 में इस टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंच कर भी खिताब से एक कदम दूर रह गए थे।

अरविंद का यहां तक पहुंचने का सफर कोई आसान सफर नहीं था… कई बार नाकामी… भेदभाव और उम्र को लेकर उठते सवालों ने उनकी राह रोकने की कोशिश की… लेकिन अरविंद ने जिंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं की… वह तो बस सुबह और शाम घंटों बैडमिंटन कोर्ट में पसीना बहाते रहे और खुद को तराशते रहे।

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साल 2006 में अरविंद के कैरियर में एक दौर ऐसा भी आया… जब चोट की वजह से उन्हें लगा कि सबकुछ खत्म हो गया है… उन्होंने खेल को छोड़ने का मन बना लिया… लेकिन सचिन तेंडुलकर के एक फोन कॉल ने उनकी दुनिया बदल दी… बकौल अरविंद, सचिन ने करीब आधे घंटे तक उनसे बात की… इस दौरान उन्हें कभी नहीं लगा कि वह फोन रखने की जल्दी में हैं।

अपने कैरियर में कई मर्तबा गंभीर चोटों से जुझ चुके सचिन ने बताया कि इन्जुरी से कैसे बाहर निकला जाता है… उनकी सलाह थी, ‘हिलिंग प्रोसेस को महसूस करो और कल्पनाओं की ऊंची उड़ान के जरिए खुद को बेहतर महसूस करो और आप पाएंगे कि बॉडी फिट हो रही है… और फिर यह कल्पना करो कि ऐसा और क्या करने की जरूरत होगी जिससे पूरी तरह से फिट होकर कोर्ट पर उतरा जाए सके।

सचिन की सलाह ने प्रेरणा का काम किया… अरविंद ने नयी इच्छाशक्ति के साथ खुद को पूरी तरह से फिट होने के लिए ट्रेनिंग प्रोग्राम ज्वाइन किया… तीन साल की मेहनत रंग लाई… जो खिलाड़ी एंकल में चोट की वजह से खेल छोड़ने की सोच रहा था… वह 29 साल की उम्र में 2009 में नेशनल चैंपियन था।

नेशनल चैंपियन बनने का इंतजार भी काफी लंबा था… युवा अरविंद 2002 में नेशनल चैंपियनशिप के फाइनल में पहुंचे थे… चैंपियनशिप पाइंट पर अरविंद सर्व कर रहे थे… लेकिन चूक कर गए…और उन्हें उपविजेता के खिताब पर ही संतोष करना पड़ा… अरविंद ने अगली बार जरूर खिताब जीतने का संकल्प लिया… नतीजा वहीं रहा 2004 में फाइनल पहुंच कर भी अरविंद खिताब से चूक गए… कुछ ऐसा ही 2006 में भी हुआ… जिसके बाद अरविंद चोट की वजह से खेल को अलविदा कहने का मन बना चुके थे।

2008 में जब अरविंद ने करीब एक साल के अंतराल के बाद चोट से उबर कर कोर्ट में वापसी की, लेकिन नतीजा नहीं बदला, खिताब एक बार फिर एक कदम दूर रह गया… इसके बाद साल 2009 आया जब उन्होंने पहली बार खिताब जीता, 2011 में भी उन्होंने यह करिश्मा दोहराया और पी. कश्यप जैसे धुरंधर खिलाड़ी को मात देकर फाइनल फतह किया।

Arvind Bhat

नेशनल चैंपियन बनने की खुशियां ज्यादा दिन नहीं रही…अरविंद को 2010 में उम्रदराज बताकर और युवा खिलाड़ियों का मौका देना की बात कहकर टीम इंडिया से बाहर कर दिया था, जबकि उस वर्ष वह नेशनल चैंपियन थे… शिकायत करने की बजाए वह फोकस होकर अपने अभ्यास में जुटे रहे… नतीजा आज सबके सामने है।

सात जून को अरविंद भट्ट 35 साल के हो जाएंगे… उम्र का यह दौर होता है जब कोई भी खिलाड़ी खेल को अलविदा कहने की दहलीज पर होता है… उस उम्र में यह युवा खिलाड़ी दुनिया फतह करने निकला है। अरविंद को इस जिद, समर्पण को सलाम।

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